रूढ़िवाद और आडंबर को तोड़ने वाले गौतम बुद्ध आज भी क्यों जरूरी हैं!


भारतीय इतिहास के पन्नों पर गौतम बुद्ध एक ऐसा नाम हैं जिसे भुलाया नहीं जा सकता। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्पन्न यह महापुरुष सम्पूर्ण विश्व के युगपुरुष बन गए। प्रायः उन्हें स्मरण करते समय लोगों को उनके ऐसे पहलुओं से परिचित नहीं कराया जाता, जो एक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव के कारण बन सके। गौतम बुद्ध के उपदेश तथा कार्यों का अध्ययन करते समय हमें तत्कालीन भारतवर्ष की सामाजिक, धार्मिक, भौगोलिक  तथा राजनैतिक  विषयों पर चर्चा करना नितांत आवश्यक हो जाता है।

सामाजिक क्रांति के अग्रनायक के रूप में गौतम बुद्ध को कैसे देखा जा सकता है? इस विषय की उपस्थापना करना समीचीन है। गौतम बुद्ध ने जहां जहां अपने जीवन-काल में विचरण किया  वहाँ की भौगोलिक स्थिति को देखा जाए, तो वह गंगा नदी के समीप का दोआब का प्रदेश दिखलाई पड़ता है। दोआब का प्रदेश होने के कारण यहा की ज़्यादातर जनता खेती किसानी करती होगी।

उस समय समाज में वैदिक कर्मकांड का ज्यादा प्रचलन था। वैदिक कर्मकांड में मुख्यतः यज्ञ प्रमुख थे। उन यज्ञों में पशु बलि देने की प्रथा एवं रूढ़ियाँ वैदिक ब्राह्मण धर्मावलम्बियों में प्रचलित थी। जिस कारण से अनेक पशुओं का यज्ञ समारंभ में बलि दिया जाता था। खेती किसानी करने वाली आम जनता के लिए पशु धन का अत्यधिक महत्व था। धार्मिक आडंबरों के चलते हिंसात्मक विधि से अनेक पशुओं की बलि देना और मेहनतकश जनता का शोषण करना ही परिलक्षित होता है।

महात्मा फुले को भारत में सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए जाना जाता है।


भारत में एक नए युग की शुरुआत करने वाले भारतीय सामाजिक सुधारकों के इतिहास में महात्मा जोतीराव फुले का स्थान अद्वितीय है। वे एक विद्रोही सुधारक के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होने न केवल नए विचारों से देश में एक नए समाज की रूपरेखा रखी, बल्कि अपने विचारों को व्यवहार में भी लाया। उन्होंने अपने वैचारिक ढांचे और कार्यों के माध्यम से कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी। 

उन्होंने जाति-व्यवस्थाब्राह्मण धर्म का वर्चस्वमहिलाओं का शोषणकिसानों और मजदूरों के उत्पीड़नसांस्कृतिक दासता आदि सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया। महिलाओंदलितोंमजदूरों और किसानों के शोषण को महसूस करने वाले महात्मा जोतीराव फुले वे पहले सामाजिक सुधारक थे, जिन्होनें सपत्नीक लैंगिक और जातिगत भेद के आधार पर शिक्षा देने की परंपरा को कड़ी चुनौती दी। भारतीय समाज बहुआयामी और विषम है। भारतीय समाज में एक बड़ी संख्या शोषित-पीड़ित-वंचित समुदाय के लोगों का है। ऐसे में सिर्फ धार्मिक कल्याण और पुण्य के नाम पर सामाजिक सुधारों के सतही उपाय करके समस्या का निराकरण नहीं किया जा सकता, अपितु समाज में आमूलचुल परिवर्तन करने से ही सामाजिक समानता और न्याय की स्थापना संभव हो सकता हैं, ऐसा उनका मत था। 

भक्ति अथवा व्यक्ति पूजा को डॉ. अम्बेडकर ने क्यों राजनीति एवं राष्ट्र के लिए पतन का मार्ग कहा?


आजकल कई लोग यह सवाल पुछते हैं कि बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बाद उनकी व्यक्ति पूजा करना क्या उचित है? इस सवाल का जवाब आपको इस लेख को पढ़ने के बाद स्वतः ही मिल जाएगा।  

आज बहुत से लोग बाबासाहब की तस्वीर को अपने घर में सम्मानवश रखते हैं। यह सम्मान सर्वथा उचित है। उनके कार्यों और विचारों के लिए बेशक वे सम्मान के पात्र हैं। लेकिन इस सम्मान में हमें अपना विवेक और तर्कपूर्ण सोच को नहीं छोड़ देना चाहिए। नहीं तो यह अविवेकपूर्ण अंधभक्ति में बदलने में देर नहीं लगेगी। यदि आज हम उनके विचारों को छोड़ कर उनका गुणगान और तस्वीरों की पूजा करना उनके प्रति सम्मान मान लेंगे, तो यह हमें अंधभक्त ही साबित करेगा। बाबासाहब खुद इस अंधभक्ति तथा मानसिक गुलामी के खिलाफ थे।

Corona न ईश्वर की परवाह करता है, न आपके गॉड और अल्लाह की।


AyatollahHashem Bathayi ईरान में धार्मिक नेता था। कोरोना से मारा गया। बहुत से पादरी इटली में मारे गए। चीन में तो नास्तिक भी मारे गए। भारत में कोई अवतार बचाने नहीं आ रहा। सब लोग घरों में कैद हैं।

जो लोग सोचते हैं कि ईश्वर-अल्लाह-गॉड उसको बचा लेगा। वह नहीं समझ पा रहा कि Corona न ईश्वर की परवाह करता है, न आपके गॉड और अल्लाह की। वह बस आपके सैनिटाइजर, मास्क और वैक्सीन से मर या दूर रह सकता है। वह परवाह करता है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में न आयें, जिनको उसका संक्रमण है। बात बस इतनी सी है।

प्रकृति में हैजा आया, प्लेग आया, HIV आया, पोलियो आया। हर बार विज्ञान ने लोगों को उसका समाधान दिया। बेशक विज्ञान ने कई गलत चीजें भी बनायीं। परमाणु बॉम्ब, कई मिसाइल, तरह तरह के हथियार, खतरनाक रसायन आदि। लेकिन विज्ञान न अच्छा होने का दावा करता है, न बुरा। हाँ उसका सही इस्तेमाल किया गया तो अच्छा होगा, बुरा इस्तेमाल किया गया तो बुरा। जैसे अगर बुखार हुआ है और आप घाव का दावा खा लेंगे, तो काम नहीं करेगा। हो सकता है रिएक्शन भी हो जाए। इसी तरह परमाणु शक्ति से आप बिजली भी बना सकते हैं, और बॉम्ब भी। यह इन्सानों पर है कि वे कैसे विज्ञान की ताकत का इस्तेमाल करते हैं।

धर्म का धंधा दिमाग को पंगु बनाये बिना संभव नहीं है

धर्म का धंधा दुनिया में क्या क्या प्रपंच कर रहा है उसे देख कर आदमी हैरान परेशान हो जाता है। कुछ दिन पहले कहीं पढ़ा था, एक आतंकवादी अपने द्वारा फोड़े बमबारी में किसी तरह बच गया। अस्पताल में होश आया तो उसे लगा कि वह मर के स्वर्ग पहुँच गया है। ऩर्स को देखकर उसने उसे अप्सरा समझ लिया। उसने झट पूछ लिया दूसरी अप्सरायें किधर हैं ?” 

इराकसीरियायमनसुडान नाईजीरिया आदि देशों में नवयुवकों को धर्म के लिए लड़ कर मरने पर स्वर्ग में अप्सराएँ मिलती है” कह कर आतंकवादी दलों में शामिल किया जाता है और धर्म के नाम पर कहे गए लफ्फाजी को सच मान कर लाखों अपरिपक्व लोग मरने के लिए तैयार हो जाते हैं। 


तस्वीर प्रतीकात्मक  वाल स्ट्रीट जर्नल से साभार।   

धर्म के नाम पर न जाने कितने भ्रम फैलाये जाते हैं और लोग धर्म के फंदों में फंसते चले जाते हैं। स्वर्ग के अनंत सुख और अमर जीवन की चाहत धर्म के नाम पर अमानवीय होने के लिए दिमाग को पंगु बना देता है। 
भारत में फिलहाल गाय के नाम पर लोगों के दिमागों का हरण चालू है और बेसिर-पैर की बातों में आकर गौ रक्षा के नाम पर धार्मिक गुंडागर्दी और मोब लिंचिंग को अन्जाम दिया जा रहा है। 
इसको फंड कहाँ से मिल रहा है क्या माफिया उन्मुलन कानूनों का इस्तेमाल गौ रक्षा के नाम पर किए जा रहे आपराधिक कृत्यों को रोकने के लिए किया जाएगा महाराष्ट्र में गौ रक्षकों के पास भारी मात्रा में विस्फोटक प्राप्त हुए हैंयह कौन का गाय प्रेम है 
गाय रक्षकों का खौफ़ इतना बढ़ चुका है कि कृषि कार्य और दूध के लिए भी गाय बैल को खरीद कर एक जगह से दूसरी जगह लेने के लिए लोग साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। न जाने गौ तस्कर के नाम पर कहाँ मॉब लिंचिंग का शिकार हो जाएँ। 
गाँवों के देश में गाय बैल पर आधारित अर्थ व्यवस्था को तोड़ने का यह कौन सा दुश्चक्र है कहीं ट्रेक्टर की मांग बढ़ाने की मार्केटिंग तो नहीं 

गाय रक्षा दलों के सदस्यों के घरों में क्यों नहीं सड़कों पर विचरण करने वाले गायों को पहुँचाने की व्यवस्था की जाएगुजरात माडल की तरह। 

आखिर सत्ता क्यों डरती है, युवाओं के प्रेम करने से?

आखिर सत्ता क्यों डरती है, युवाओं के प्रेम करने से? यह सवाल एक ऐसा सवाल है जिसकी जड़ें आप खोजें, तो कई ऐसी चीजों से आपका साबका पड़ेगा जो आपने कभी सोचा नहीं होगा कि प्रेम का सम्बन्ध इनसे भी हो सकता है. प्रेम से सत्ता को डरने के कारणों की पीछे जायें, उससे पहले प्रेम और सत्ता को समझना-जानना ज़रूरी है. प्रेम क्या है? प्रेम इंसानियत की स्वतः प्रेरित एक ऐसी भावना है जो प्राकृतिक रूप से किसी जोडती है, एक दुसरे के करीब लाती है, कृत्रिम भेदों को मिटाकर दो इंसानों को एक पथ का साथी बनाती है. साथ ही उसके बारे में बिना किसी पूर्वाग्रह, बिना किसी लोभ लालच, बिना किसी डर के उसे मन में बसा लेती है. प्रेम की बाह्य अभिव्यक्ति तो बाद में आती है, जो आगे चलकर विवाह, सेक्स या संतानोत्पत्ति के रूप में परिलक्षित होती है. प्रेम उतना ही प्राकृतिक है जितना आपका खतरनाक पशु को देखकर डर जाना. आपका बारिस होने पर किस पेड़ के नीचे बचने की कोशिश करना अथवा बारिस में उन्मुक्त भींगकर उसका आनंद लेना.

जब आप प्रेम की भावना में होते हैं, तो आप यह नहीं सोचते कि आपकी सामाजिक हैसियत क्या है, जेब में पैसे हैं या नहीं, आपकी जाति क्या है, आपका धर्म क्या है, आप किस विचारधारा से सम्बन्ध रखते हैं, आप किसे वोट देते हैं, आपके माँ-बाप प्रेम के बारे में क्या सोच रखते हैं, आपका समाज प्रेम के बारे में और आपके बारे में क्या सोच रखता है. आप जब प्रेम में होते हैं, तो ये चीजें और व्यवस्थायें जिसको समाज ने कृत्रिम रूप से बनाया है, उसको याद नहीं रख पाते.
अब सत्ता पर आते हैं. सत्ता क्या है? किसी व्यक्ति, समाज, वर्ग, समुदाय पर स्वैच्छिक अथवा जबरदस्ती शासन करना सत्ता है. जानकर-बुझकर अथवा अनजाने ही अपने पूर्वजों से प्राप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सुविधा के कारण भी हमारे पास सत्ता हो सकती है. सत्ता के उदाहरण है राजनैतिक पद पर होना और विशेष सुविधा और अधिकार को पाना तथा उपभोग करना. राजनैतिक पद पर होना चुनाव के माध्यम से भी हो सकता है और विरासत के माध्यम से भी, अथवा दोनों के संयोग से भी, यह संभव हो सकता है. उदाहरण के लिए भारत में एक प्रत्याशी अपनी मेहनत और काम से विधायक या सांसद बन सकता है अथवा उसे विरासत में मिली आर्थिक सम्पदा की मदद से अथवा परिवार में किसी राजनैतिक पद वाले व्यक्ति की मदद से. इसके अतिरिक्त उसकी जाति, उसका धर्म, उसका वर्ण, उसकी सामाजिक हैसियत, सामाजिक व्यवस्थायें आदि भी मदद कर सकती हैं. भारत में, राजनीति में धर्म, जाति, राजनैतिक सम्बन्ध और आर्थिक स्थिति ही ज्यादा मायने रखती है, योग्यता तुलनात्मक रूप से कम. इसकी पड़ताल आप राजनेताओं के उनके भ्रष्टाचार के मामलों और आपराधिक कृत्यों के बारे में गूगल में खोज कर आसानी से जान सकते हैं.  

अब हम आते हैं अपने मूल सवाल पर. वो यह कि सत्ता प्रेम करने वाले युवाओं से क्यों डरती है? हम जानते हैं कि सत्ता की एक प्रवृति होती है, उसे बनाये रखने की कोशिश करना. बार बार किसी भी प्रकार चुनाव जीतना, या जन्म के आधार पर वही सुविधायें और सहूलियत परत करना. इस कोशिश में, वह किसी भी हद तक जाने से भी नहीं चुकती.

इंसान को गुलाम बनाने के लिए जो रस्सी है उसे "धर्म" कहते हैं



जानवरों को काबू में करने के लिए उनकी नाक में छेद करके रस्सी डाली जाती है। फिर चाबुक के डर और रस्सी के खींच और ढील से वो अपने मालिक की अनचाही गुलामी करने को मजबूर होता है।

इसी तरह इंसान को गुलाम बनाने के लिए जो रस्सी है उसे "धर्म" कहते हैं जिसमें रस्सी डाली जाएगी उस छेद को "आस्था" कहते हैं और जिस चाबुक से हांका जाएगा उसे "ईश्वर" कहते हैं।

ऐसे गुलाम इंसान जानवरों से भी बद्तर हैं क्योंकि जानवर अपने नाथ से नफरत करता है और उसे छुड़ाने की कोशिश उम्र भर जारी रखता है पर गुलाम इंसान तो अपनी नाथ से प्यार करता है।

जो भी इसको छुड़ाने की कोशिश करता है ये उसी पर हिंसक हो जाते हैं।

इसलिए कोई भी शासक "आस्था" नामक छेद को ठीक करने की कोशिश नहीं करता। शासक ये सोचते हैं कि अगर वे कोशिश करेंगे तो उनकी सत्ता चली जाए।

इस बात पर और संसार के चलन पर ध्यान देंगे तो आप भी समझ सकते हैं कि ऐसे गुलामों को आजाद नहीं करवाया जा सकता जो अपनी नाथ से प्रेम करते है।

नोट: यह लेख WhatsApp से प्राप्त है। इसके मूल लेखक का पता नहीं है। यदि यह पोस्ट लेखक तक पहुंचता है, तो कृपया सूचित करें। आपका नाम बतौर लेखक साभार शामिल करने में हमें हर्ष होगा।  

आदिवासी जीवन-मूल्य, "हम कैसे खुश हो सकते हैं, जबकि दूसरे उदास हों?"


एक मानव-विज्ञानी एक अफ्रीकी आदिवासी बच्चों के लिए एक खेल का प्रस्ताव रखा। वह एक पेड़ के पास फल से भरी एक टोकरी रख दिया और बच्चों को बोला कि जो कोई वहाँ सबसे पहले जायेगासारे फल उसके हो जायेंगे। जब उसने देखा कि सारे बच्चे आपस में हाथ जोड़ लिए हैं और एक साथ उस टोकरी की ओर बढ़ रहे हैं। फिर एक साथ बैठकर आनंद से फल को खा रहे हैं। मानव विज्ञानी ने पूछा, "उन्होंने ऐसा क्यूँ कियाजबकि सारे फल कोई एक ले सकता था?" उन्होंने कहा 'उबुन्तु' लेकिन हम कैसे खुश हो सकते हैंजबकि दूसरे उदास हों खोसा संस्कृति में 'UBUNTUका अर्थ है - "मैं हूँ क्योंकि हम हैं"। 

आखिर बलात्कार के लिए जिम्मेदार कौन है?


इन दिनों बलात्कार के मामले अखबारों और न्यूज़ चैनलों में सुर्खियाँ बन रहे हैं। एक के बाद एक ऐसे मामले रुकने के नाम हीं नहीं ले रहे। ऐसा नहीं है कि अभी कुछ दिनों से बलात्कारों की संख्या में एकदम से बढ़ोत्तरी हो गई हो, बल्कि ये घटनाएं लम्बे समय से जारी हैं, पर शायद घटनाओं की रिपोर्टिंग बढ़ गयी है। इसका एक कारण शिक्षित लड़कियों का अपने प्रति हो रहे शोषण के प्रति हिम्मत दिखाना हो सकता है। साथ ही समाज का किसी भीवत्स घटना के प्रति उद्वेलित एवं आक्रोशित होकर न्याय के पक्ष में खडा होना भी हो सकता है, यह आज लोगों की इन्टरनेट के उपयोग से मीडिया में आसान पहुँच संभव दीखता है। मीडिया का भी ऐसी घटनाओं का दिखाना लोगों द्वारा ऐसी घटनाओं से भावनात्मक रूप से जुड़ना हो सकता है। जनता के उस भावनात्मक रुझान को देखते हुए प्रमुखता से, प्रतिक्रिया को उभार कर ताबड़-तोड़ रिपोर्टिंग से अपनी टीआरपी बढ़ाने की चाह है शायद।

बलात्कार के मामलों में बहुत कुछ हमारा समाज और परिवार ज़िम्मेदार है। हम अपनी लड़कियों को तो कई संस्कार सिखाने को उतावले होते हैं और कई बार तो चेतावनी तक देते हैं। कहते हैं यह नहीं सीखोगी तो ससुराल में ऐसा होगा, वैसा होगा। क्या लड़कों के साथ हम ऐसा ही व्यव्हार व दृष्टि अपनाते हैं? इस तरह से लड़कों से बात करनी है। इस तरह से नहीं करनी। इस तरह के कपड़े पहनने हैं। कितना बोलना हैं, कितना नहीं बोलना इत्यादि।

हम अपने लड़कों को यह तो सिखाते हैंकिसी तरह के पचड़े में नहीं पड़ना लेकिन हम ये नहीं सिखाते लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार करना हैउसे सम्मान देना है और बराबर समझना है। भेदभाव वाली मानसिकता कोई एक दिन में नहीं बनती। ऐसी सोच कई वर्षों की संस्कृति का परिणाम होती है, जो अंततः शोषण और भेदभाव को पैदा करती है। एक को श्रेष्ठ और दूसरे में हीन भावना भरती है। बलात्कार तो इस गैर बराबरी और शोषण का एक लक्षण मात्र है। 

रवांडा: जहाँ की पार्लियामेंट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सर्वाधिक है


रवांडा की पार्लियामेंट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दुनिया के किसी भी देश से अधिक है। उसने अपने पहले के रिकॉर्ड (64%) को तोड़ते हुए आज 67.5% कर दिया। इसका एक कारण ये भी है कि रवांडा ने 1959 और 1994 में दो भीषण जनसंहार झेल चुका है। वहां अब लोगों में ये बात घर करने लगी है कि महिलायें होंगी तो युद्ध अथवा जनसंहार (जेनोसाइड) जैसी आशंका कम होगी। ध्यान दें भारत की सांसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 11% है।

आओ कुछ बातें जानते हैं रवांडा के बारे में:

यहाँ स्वच्छता को लेकर बेहद जागरूकता है। किगाली (रवांडा की राजधानी) दुनिया की सबसे साफ़ सुथरी राजधानी है। यहाँ प्लास्टिक पॉलिथीन निषेध है।

यहाँ सड़क पर चप्पल पहनकर चलना मना है क्योंकि ये हाइजीनिक नहीं होता। इससे गंदगी इधर-उधर, दूसरे लोगों तक जल्दी फैलती है।

यहाँ लॉन (घास) पर चलकर पार करना अपराध है। ये प्रकृति की हरियाली बचाए रखने के सैकड़ों तरीकों में से एक तरीका है। ये उनकी आदिवासी संस्कृति की खूबसूरती है।

हर महीने के आख़िरी शनिवार को यहाँ देश के सभी वयस्क नागरिकों द्वारा कम्युनिटी सर्विस किया जाता है जैसे सड़कों-गलियों की सफ़ाई और गरीब लोगों के घरों का सार्वजनिक निर्माण व मरम्मत।

एक और बात राजधानी किगाली में बाइक टैक्सी चलती है। यहाँ तो लूट के भाग जायें लोग। भरोसे ईमानदारी की बात है।

तारा शंकर की वॉल से साभार।  

माता रमाबाई को लिखा गया खाश पत्र; "मेरे सामने बहुत बड़े उलझे गणित हैं।"

बाबा साहेब द्वारा अपनी पत्नी रमाबाई को लिखा गया यह पत्र इतिहास की कई घटनाओं को भी समेटे है, भावनात्मक उद्गार के अलावा। माता रमाबाई द्वारा बाबा साहेब को मिला सहयोग तो परिलक्षित है ही, बेटे यशवंत के साथ आगे की राजनीति और उनके संबंध को भी यह स्पष्ट करता है। पढ़िए यह पत्र और समझने का प्रयास कीजिये बाबासाहेब और माता रमाबाई का संघर्ष व त्याग  


लंदन
30 दिसंबर 1930

प्रिय रामू!
तू कैसी है? यशवंत कैसा है? क्या मुझे याद करता है? उसका बहुत ध्यान रख रमा! हमारे चार बच्चे हमें छोड़ गए। अब यशवंत ही तेरे मातृत्व का आधार है। उसका ध्यान हमें रखना ही होगा। पढ़ाना होगा। विकसित करना होगा। खूब बड़ा करना होगा। उसे निमोनिया की बीमारी है। 

मेरे सामने बहुत बड़े उलझे गणित हैं। सामाजिक पहेलियॉं हैं। मनुष्य की धार्मिक ग़ुलामी का, आर्थिक और सामाजिक असमानता के कारणों की परख करना है। गोलमेज़ परिषद की अपनी भूमिका पर मैं विचार करता हूँ और मेरी ऑंखों के सामने देश के सारे पीड़ितों का संसार बना रहता है। दुखों के पहाड़ के नीचे इन लोगों को हज़ारों वर्षों से गाड़ा गया है। उनको उस पहाड़ के नीचे से निकालने के मार्ग की तलाश कर रहा हूँ। ऐसे समय में मुझे मेरे लक्ष्य से विचलित करनेवाला कुछ भी होता है तो मेरा मन सुलग जाता है। ऐसी ही सुलगन से भरकर मैंने यशवंत को निर्दयतापूर्वक मारा था। 

उसे मारो मत! मासूम है वह! उसे क्या समझता है? व्याकुल होकर तूने ऐसा कहा था। और यशवंत को गोद में भर लिया था। पर रमा मैं निर्दयी नहीं हूँ। मैं क्रांति से बाँधा गया हूँ। आग से लड़ रहा हूँ। अग्नि से लड़ते-लड़ते मैं खुद अग्नि बन गया हूँ। इसी अग्नि की चिंगारियॉं मुझे पता ही नहीं चलता कि कब तुझे और हमारे यशवंत को झुलसाने लगती हैं. रमा! मेरी शुष्कता को ध्यान में रख। यही तेरी चिंता का एकमात्र कारण है। 

तू ग़रीब की संतान है। तूने मायके में भी दुख झेला। ग़रीबी से लिथड़ी रही। वहॉं भी तू भर पेट खाना न खा सकी। वहॉं भी तू काम करती रही और मेरे संसार में भी तुझे काम में ही लगना पड़ा, झिजना पड़ा। तू त्यागी है, स्वाभिमानी है। सूबेदार की बहु जैसे ही रही। किसी की भी दया पर जीना तुझे रुचा ही नहीं। रुचता ही नहीं। देना तू अपने मायके से सीखकर आई। लेना तूने सीखा ही नहीं। इसलिए रमा तेरे स्वाभिमान पर मुझे गर्व होता है। 

पोयबाबाड़ी के घर में मैं एक बार उदास होकर बैठा हुआ था। घर की समस्या से मैं बदहवास हो गया था। उस वक़्त तूने मुझे धैर्य प्रदान किया। बोली

मैं हूँ न संभालने के लिए। घर की परेशानियों को दूर करूँगी। 
घर के दुखों को आपकी राह में अवरोध बनने नहीं दूँगी।
मैं ग़रीब की बेटी हूँ। परेशानियों के साथ जीने आदत है।
आप चिंता न करें, मन को कमजोर न करें। 
संसार का काँटों भरा मुकुट जान में जान रहने तक उतारकर नहीं रखना चाहिए। 

रामू! कभी-कभी लगता है कि यदि तू मेरे जीवन में नहीं आती तो क्या होता। संसार केवल सुखों के लिए है -ऐसा माननेवाली स्त्री यदि मुझे मिली होती तो वह कब का मुझे छोड़कर जा चुकी होती। मुंबई जैसी जगह में रहकर आधा पेट रहकर उपले बेचने जाना या फिर गोबर बीनकर उपले थापना भला किसे पसंद आता? वकील की पत्नी कपड़े सिलती रही। अपने फटे हुए संसार को थिगड़े लगाना भला किसे पसंद है? पर तूने ये सारी परेशानियॉं उठाई, पति के संसार को पूरे सामर्थ्य के साथ आगे बढ़ाया।

मेरे पति को अच्छे वेतन की नौकरी मिली, अब हमारे सारे दर्द दूर होंगे, इस ख़ुशी में ही मैंने तुझेये दो लकड़ियों की पेटी, इतना ही अनाज, इतना ही तेल-नमक और आटा और इन सबके बाद हम सबकी देखभाल करते हुए गुज़ारा करना है-ऐसा बोला था। तूने ज़रा भी ना नुकूर किए सारा कुछ संभाला। रामू! मेरी उपस्थिति में और मेरे पीछे जो तूने किया वह कोई और कर सके, ऐसा सामर्थ्य किसी में नहीं है। 

रामू! तेरे जैसी जीवन संगिनी मुझे मिली इसलिए मुझे शक्ति मिलती रही। मेरे सपनों को पंख मिले। मेरी उड़ान निर्भय हुई। मन दृढ़ हुआ। मन बहुत दिनों से भर भर रहा था। 

ऐसा कई बार लगा कि तेरे साथ आमने सामने बात करना चाहिए। पर दौड़-भाग, लिखना-पढ़ना, आना-जाना, भेंट-मुलाक़ात में से समय निकाल ही नहीं पाया। मन की बातें मन में ही छुपाकर रखना पड़ा। मन भर-भर आया पर तेरे सामने कुछ कह नहीं सका। 

आज शांतिपूर्ण समय मिला और सारे विचार एकमेक हो रहे हैं। मन बेचैन हुआ। इसलिए बुझे हुए मन को मना रहा हूँ। मेरे मन के सारे परिसर में तू ही समाई हुई है। तेरे कष्ट याद आ रहे हैं। तेरी बातें याद आ रही हैं। तेरी बेचैनी याद आ रही है। तेरी सारी घुटन याद आई और जैसे मेरी सांसें ख़त्म होने लगीं, इसलिए क़लम हाथ में लेकर मन को मना रहा हूँ। 

रामू! सच्ची कहता हूँ तू मेरी चिंता करना छोड़ दे। तेरे त्याग और तेरी झेली हुई तकलीफ़ों का बल मेरा संबल है। भारत का ही नहीं परंतु इस गोलमेज़ परिषद के कारण सारे विश्व के शोषितों की शक्ति मुझे बल प्रदान कर रही है। तू अब अपनी चिंता कर। 

तू बहुत घुटन में रही है रामू! मुझ पर तेरे कभी न मिटनेवाले उपकार हैं। तू झिजती रही, तू कमजोर होती रही, तू गलती रही, जलती रही, तड़पती रही और मुझे खड़ा किया। तू बीमारी से तंग आ चुकी है। स्वयं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए इसकी तूने चिंता ही नहीं की। तुझे अब अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना ही होगा। यशवंत को मॉं की और मुझे तेरे साथ की ज़रूरत है। और क्या बताऊँ

मेरी चिंता मत कर, यह मैंने कितनी बार कहा तुझसे पर तू सुनती ही नहीं। मैं परिषद के समाप्त होते ही आऊँगा। 
सब मंगल हो। 

तुम्हारा 
भीमराव


अनुवाद : प्रो. हेमलता महिश्वर

आस्था को भड़का कर उनकी कमाई पर जीनेवाले, ये परजीवी संन्यासी !

तस्वीर प्रतीकात्मक ‘ध्रुव गुप्त’ की वाल से साभार।

प्रयाग के अर्द्धकुंभ मेले में जिन लाखों साधु-संन्यासियों के शाही स्नान और भव्य कल्पवास के लिए सरकार ने चार हजार करोड़ खर्च किए और जिनके लिए अब 'भारत रत्न' की भी मांग होने लगी है, उनका हमारे देश और समाज की बेहतरी में क्या योगदान है ? लोगों की आस्था को भड़का कर उनकी कमाई पर विलासिता का 'संन्यास' जीने वाले ये लोग वस्तुतः समाज के सबसे बड़े परजीवी रहे हैं।

यह बात सभी धर्मों के धर्मगुरुओं के लिए सच है। ऐसे करोड़ों परजीवी लोगों की चिंता में हमारी दुनिया नहीं, दुनिया से परे कोई काल्पनिक लोक है। उनके लिए संसार मिथ्या है और इसमें आवागमन से मुक्ति जीवन का लक्ष्य। उनकी आध्यात्मिक कसरत मानसिक एकाग्रता के लिए तो ठीक है, उनके माध्यम से अगर वे संसार का अतिक्रमण कर किसी काल्पनिक स्वर्ग या मोक्ष की तलाश में हैं, तो यह आत्मरति के सिवा कुछ नहीं।

तमाम अस्तित्व, मोह-माया, इच्छाओं और गति से परे मोक्ष शून्य की ही कोई स्थिति हो सकती है और कोई भी शून्य अस्तित्व या ऊर्जा के पूरी तरह नष्ट हो जाने से ही संभव है। ऊर्जा चाहे पदार्थ की हो या जीवन की, कभी नष्ट होती नहीं। उसका रूपांतरण होता चलता है। हम छोटी-छोटी ऊर्जाएं हैं जो रूप बदल-बदलकर इसी प्रकृति में बनी रहेंगी।

यदि ईश्वर सच है तो उसकी कृति मिथ्या नहीं हो सकती। उसकी सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य और उससे उत्पन्न संवेदना, प्रेम और करुणा ही उस तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है। यह प्रकृति उसी की प्रतिच्छवि है। सूरज-चांद-तारों में है उसका नूर। फूलों में उसकी मुस्कान। बच्चों की हंसी में उसकी मासूमियत। स्त्रियों में उसका ममत्व। नदी, समुद्र, बादल और पक्षियों के संगीत में उसका स्वर। प्रकृति से संपूर्ण सामंजस्य और उसकी संतानों के बीच परस्पर प्रेम और सहकार में ही स्वर्ग, मोक्ष और निर्वाण है।

इसे पाने के लिए तमाम धार्मिक कर्मकांड या कठोर साधना की नहीं, छोटे बच्चों की चमकती आंखों और मासूम दिल की दरकार होती है। एक शफ्फाफ़ सा दिल, इक ज़रा भोली आंखें
ये अगर है तो उसके नूर से खाली क्या है !

ध्रुव गुप्त की वाल से साभार