भक्ति अथवा व्यक्ति पूजा को डॉ. अम्बेडकर ने क्यों राजनीति एवं राष्ट्र के लिए पतन का मार्ग कहा?


आजकल कई लोग यह सवाल पुछते हैं कि बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बाद उनकी व्यक्ति पूजा करना क्या उचित है? इस सवाल का जवाब आपको इस लेख को पढ़ने के बाद स्वतः ही मिल जाएगा।  

आज बहुत से लोग बाबासाहब की तस्वीर को अपने घर में सम्मानवश रखते हैं। यह सम्मान सर्वथा उचित है। उनके कार्यों और विचारों के लिए बेशक वे सम्मान के पात्र हैं। लेकिन इस सम्मान में हमें अपना विवेक और तर्कपूर्ण सोच को नहीं छोड़ देना चाहिए। नहीं तो यह अविवेकपूर्ण अंधभक्ति में बदलने में देर नहीं लगेगी। यदि आज हम उनके विचारों को छोड़ कर उनका गुणगान और तस्वीरों की पूजा करना उनके प्रति सम्मान मान लेंगे, तो यह हमें अंधभक्त ही साबित करेगा। बाबासाहब खुद इस अंधभक्ति तथा मानसिक गुलामी के खिलाफ थे।

डॉ. अम्बेडकर जिस जाति-व्यवस्था को ध्वस्त करना चाहते थे तथा समतामूलक समाज का निर्माण करना चाहते थे, उसे हमें भूलना नहीं चाहिए। उनके सपनों और विचारों को भारत में लागू करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए, न कि उनका भक्त बनना। वर्तमान भारतीय समाज को देखें, तो जाहिर होता है कि भक्त बनना कितना आसान है। भक्ति या कहें अंधभक्ति भारतीय समाज के स्वभाव में रहा है, कारण चाहे जो भी हो। दरअसल बात यह है कि भक्त बनने में न तो बुद्धि का इस्तेमाल करना आवश्यक होता है न तथ्य का। जिन लोगों की अपनी स्वयं की कोई सोच या विचार पद्धति नहीं होती, उनके लिए भक्त होना आसान है।

उसके लिए न तर्कबुद्धि की जरूरत है और न ही अनुभव अथवा तथ्य की। जिस प्रकार अन्धा व्यक्ति दूसरों पर निर्भर रहता है, उसी प्रकार भक्त भी परावलम्बी होते है। इसमें धर्म, आडंबर, अंधविश्वास आदि ही एक भक्त के अवलंब बन जाते हैं।

अब आते हैं मूल सवाल की ओर कि क्या डॉ. अम्बेडकर व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे?

25 नवम्बर 1947 के अपने संविधान सभा के भाषण में जॉन स्टुअर्ट मिल का उदाहरण देते हुए कहते हैं है, "उन महान व्यक्तियों का जिन्होंने जीवन पर्यन्त देश सेवा की है, उनका कृतज्ञ होने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इस कृतज्ञता की सीमा है। भक्ति अथवा व्यक्ति पूजा हमारे देश की राजनीति में दूसरे राष्ट्रों की अपेक्षा अधिक है। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मोद्धार का मार्ग हो सकती है। परन्तु राजनीति एवं राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में भक्ति एवं व्यक्ति पूजा अपरिहार्य रूप से पतन लाती है और अन्ततः तानाशाही में परिणत होती है।"

एक अन्य उद्धरण देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा हैं कि आयरीश विद्वान डॅनियल ओकानेल के अनुसार "कोई भी व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता की बलि देकर कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर सकता, कोई स्त्री अपना चरित्र अर्पण कर कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर सकती और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतन्त्रता की बलि देकर कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर सकता।"

डॉ. अम्बेडकर का कहना था कि कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, लोगों को अपनी स्वतन्त्रता का बलिदान उसके समझ नहीं करना चाहिए।

इन सभी बिन्दुओं के आलोक में क्या डॉ. अम्बेडकर की व्यक्ति पूजा उचित है? डॉ. अम्बेडकर की व्यक्ति पूजा होने का तात्पर्य, उनके विचारों को खत्म कर देने जैसा है।  किसी व्यक्ति के विचारों की चित्ता जलाने का सबसे आसान तरीका होता है, उनके विचारों को पढ़ने, विचार करने और समाज में लागू करने की जगह; उस व्यक्ति की पूजा और भक्ति शुरू कर देना।

डॉ. अम्बेडकर का विचार अपने जीवन में लागू करना ही उनके प्रति उचित सम्मान है, न कि उनका अतिशय गुणगान व भक्ति करना। अम्बेडकरवादी होने का अर्थ है, उनके विचारों का समाज में व्याप्त शोषण के खिलाफ इस्तेमाल करना और जाति के बंधनों को तोड़ने का प्रयास करना। आज अम्बेडकर व्यक्ति से अधिक एक विचार है, जिसका अर्थ है, समाज में स्वतन्त्रता, समानता, बंधुत्व एवं सामाजिक न्याय की स्थापना करना।

रूढियों और परम्पराओं के खिलाफ होना तथा तर्कसंगत एवं विज्ञाननिष्ठ होना ही अम्बेडकर का विचार है। अम्बेडकर का विचार किताबों में है, न कि मूर्ति, झण्डा या भक्ति में। इसलिए अम्बेडकर की भक्ति नहीं उनके विचारों को पढ़े और जीवन में लागू करने का प्रयास करे।

  – शुभमचित्त

लेखक सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालयसे बौद्ध अध्ययन विषय पर पी-एच.डी. कर रहे हैं।