कौमें अपने साथ हुए अत्याचारों को नहीं भूलती

अरबिंदो घोष की एक महत्वपूर्ण किताब है - "द ह्यूमन साइकल" कुछ अन्य किताबें है "लाइफ डिवाइन" और "मानव एकता का आदर्श". ये किताबे हालांकि ब्राह्मणवाद के जहर में आकंठ डूबी हैं लेकिन इनमें एक मजेदार बात है। 

पहली किताब "द ह्यूमन साइकल" में समय और क़ौमों की याददाश्त की बात आती है। अरबिंदो लिखते हैं कि कौमें अपने साथ हुए अत्याचारों को भूलती नहीं हैं। समय की अपनी याददाश्त होती है।



ये बात सही है। आज के भारत मे इसे होता हुआ देखा जा सकता है और भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है। इसी से वर्तमान को भी समझा जा सकता है।

एक उदाहरण देखिये, चुनाव का मौसम आते ही मुस्लिमो के खिलाफ नफरत और अफवाह भरे मेसेज अचानक बढ़ गए हैं। ऐसे में हर आदमी बार बार सोच रहा है कि इस घनघोर प्रचार का मतलब क्या है? एक समुदाय विशेष के खिलाफ इस दुष्प्रचार का परिणाम हम देश भर में देख चुके हैं।

लेकिन असल सवाल ये है कि नफरत और दुष्प्रचार फैलाने वालों को आने वाला समय क्या देगा?? इतिहास को गौर से देखें तो इसका परिणाम अंत मे ये होगा कि किसी एक समुदाय को निशाने पर लेने वाले खुद ही निशाने पर आ जाएंगे।

बस कुछ साल और इंतज़ार कीजिये, सदियों से हर जाति और समुदाय को छुआछूत, भेदभाव और नफरत और जहालत सिखाने वाले समुदाय के खिलाफ पूरा देश इकट्ठा हो रहा है।

अब जल्द ही नफरत की फसल बोने वाले लोग स्वयं नफरत के केंद्र में आने वाले हैं।

नफरत किसी के भी खिलाफ हो, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन समय अपने हिसाब से न्याय करता है। भारत के करोड़ो लोगों को जिन मुट्ठी भर लोगो ने जानवरों सा जीवन जीने को बाध्य किया, शिक्षा स्वास्थ्य और सम्मान ही नहीं बल्कि भोजन और पानी तक से वंचित किया - उन मुट्ठी भर लोगों को आने वाला समय क्या देगा?

इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। जिन्होंने नफरत सिखाई है नफरत की फसल बोई है ये फसल उन्हें ही काटनी होगी।

प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप का इतिहास देखिये, भारत उसी रास्ते पर है।

लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि भारत के बहुजनों और अल्पसंख्यक समुदायों को आपस मे लड़ाने वाले लोगों को ये बात समझ मे नही आ रही है। उन्हें अभी भी यही लगता है कि वे पुराण और कथा वाली स्टाइल में न्यूज चैनल, फिल्मो, प्रिंट मीडिया सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके आगे भी भारत के मूलनिवासियों और अल्पसंख्यक लोगों को आपस मे लड़वाते रहेंगे।

समय की और कौमों की याददाश्त कभी बेकार नहीं जाती। कौमें अपने खिलाफ हुई बर्बरता और अपमान को कभी नहीं भूलती हैं। अभी सख्त जरूरत इस बात की है कि नफरत का सनातन कारोबार करने वाले लोग अपने षड्यंत्र बन्द करें और सभी समुदाय अंबेडकर और फूले के विचार मानकर रोटी बेटी के संबन्ध शुरू करें।

अगर यह नहीं होता है तो उन षड्यंत्रकारियों की अगली पीढ़ियों के भविष्य बहुत निराशाजनक होगा।

संजय श्रमण