युगपुरुषों का इंतज़ार की बजाय, अन्दर छुपे क्रांतिवीर को बाहर लायें

हम चाहे खुद के कितना भी विद्वान होने का भ्रम पाल लें असल मे हम बहुत सी अवधारणाओं से मुक्त नही हो पाते और आगे चलकर यही अवधारणाएं हमारी सबसे बड़ी समस्या बन जाती हैं।  कोई भी आदमी पूर्ण नही होता, इसलिए कोई अकेला आदमी समाज नही बदल सकता। आज हमारी सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हम किसी एक को आगे कर अपनी जिम्मेदारियों से छूटने की कोशिश करते हैं। 


वो जमाना और था जब युगपूरुष हुआ करते थे। वे इसलिए महान हुए क्योंकि उनमें त्याग और बलिदान की ताकत थी, जो आज हममे नही है। युगपूरुष बनने के लिए लंबा संघर्ष और महान बलिदानों की जरूरत होती है। 
लेकिन आज हम संघर्षों और बलिदानों की चाहे कितनी ही बकैती कर लें, इन्हें अपने जीवन का अंग बनाने में सक्षम नही हैं। इसलिए आज हममें से कोई भी कभी युगपूरुष नही बन सकता।
अगर आपके अंदर समाज को बदलने की चाहत कुलांचे मारती है। विषमताओं के प्रति आक्रोश उमड़ता है। अन्याय के प्रति क्रोद्ध प्रखर होता है और अगर आपके अंदर क्रांति की ज्वाला जलती है, तो समझिए आपके अंदर कोई न कोई युगपूरुष छुपा हुआ है। लेकिन आपकी व्यक्तिगत समस्याएं उस युगपूरुष को बाहर आने से रोक देती हैं।
हम अपने बन्धनों को तोड़ नही सकते, तो हम कुछ नही कर सकते। अगर हम अपने आदर्शों को जानते हैं, समझते हैं, उन्हें पढ़ते है और उनके बलिदानों से प्रेरित होते हैं, तो उनके संघर्षों को आगे ले जाने के लिए आज हम खुद क्या कर रहे हैं ?
आज जरूरत इस बात की है कि हम युगपुरुषों का इन्तेजार करने के बजाय अपने अंदर छुपे बैठे क्रांतिवीर को बाहर निकालें। किसी और का इन्तेजार क्यों? हम खुद क्यों नही आगे आते?

सकील प्रेम