धर्म पर उठे सवाल का जवाब देने की जगह विज्ञान का विरोध क्यों ?

धर्म की आलोचना करने पर कुछ लोग विज्ञान का विरोध करना शुरू कर देते हैं। ऐसा अक्सर तब होता है जब वे अपनी धार्मिक मान्यताओं की सत्यता के पक्ष में कोई प्रमाण देने और उन्हें तर्कसंगत सिद्ध करने में विफल रहते हैं। वे कहते हैं देखिये विज्ञान द्वारा बनाये खतरनाक परमाणु हथियारों के कारण आज दुनिया तबाही के मुकाम पर खड़ी है। 

विज्ञान की खोजों के कारण हुए तीव्र औद्योगिक विकास के कारण लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। तमाम तरह के उत्सर्जन पृथ्वी के वातावरण में जहर घोल रहे हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में हुयी वृद्धि के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिसके कारण मौसम अनियंत्रित हो रहे हैं। वैसे इसमें कोई भी संदेह नहीं कि उनकी ये सभी चिंताएं वास्तविक हैं, लेकिन क्या इन सब का दोष विज्ञान को दिया जा सकता है?


यह सच है कि वैज्ञानिक खोजों ने ही औद्योगिक विकास की नींव रखी थी, और बढ़ते पूंजीवाद और उपभोक्तावाद के दौर में एक बार जब इस सिलसिले ने रफ़्तार पकड़ी तो फिर यह बढ़ता ही गया। क्योंकि यह प्रगतिशीलता, सम्पन्नता और शक्तिशाली होने का प्रतीक बन गया। इस बढ़ते औद्योगिकीकरण ने बहुत सारी समस्याओं को जन्म दिया है लेकिन हमें यह सच्चाई भी स्वीकार करनी चाहिए कि इसने हमारे जीवन को सुविधाजनक भी बनाया है और हमें बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिलाया है। 

पहले जहाँ दुनिया भर में तमाम लोग महामारियों और असाध्य रोगों से असमय काल कलवित हो जाते थे वहीँ आज चिकित्सा विज्ञान में हुयी प्रगति के कारण बहुत सी महामारियों और कभी असाध्य रहे रोगों का पूर्ण निदान संभव हुआ है। दुनिया के विभिन्न भागों में औसत आयु में हुयी वृद्धि जो कि पहले की तुलना में दुगनी हो गईऔर शिशु म्रत्यु दर में आई कमी का श्रेय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को ही दिया जाता है। 

इसके अलावा तमाम ऐसे आविष्कार जिन्होंने हमारे जीवन में क्रांति ला दी, जिनके बिना आज जीना हमें मुश्किल मालूम पड़ता है और दुनिया को एक ग्लोबल विलेज बनाकर रख दिया। देखा जाये तो विज्ञान ने जितना हमें दिया है उसकी तुलना में इसके साइडइफेक्ट कुछ भी नहीं हैं। इतने साइडइफेक्ट तो किसी भी नए कार्य को करने में हो सकते हैं।
जब हम किसी नए मार्ग पर आगे बढ़ते हैं तो उसमें आने वाली सभी चुनौतियों का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता, भले ही हम कितनी ही तैयारी के साथ निकलें। कुछ चुनौतियाँ ऐसी जरुर होंगी जो मार्ग पर चलने के बाद ही सामने आयेंगी। विज्ञान के साथ भी ऐसा ही है। विज्ञान भी अज्ञात कि खोज में लगातार नए मार्गों पर सफ़र कर रहा है जिसमें उसे सफलता के साथ साथ कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। 
और ऐसा भी नहीं है कि वह उन चुनौतियों को नजरअंदाज करके आगे बढे जा रहा है, वह लगातार उनसे निपटने के लिए भी काम कर रहा है और उसमें उसे सफलता भी मिल रही है। उदाहरण के तौर पर पिछली एक से अधिक शताब्दी से हम उर्जा के लिए मुख्यतः जीवश्मिक ईंधनों पर आश्रित हैं जिनसे हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है और जो पर्यावरण के लिए घातक है। लेकिन विज्ञान ने इस चुनौती को नजरंदाज नहीं किया और एक शताब्दी के भीतर ही नयूक्लिर एनेर्जी, सोलर एनेर्जी, विंड एनेर्जी, बायोफ्यूल इत्यादि जैसे तमाम वैकल्पिक उर्जा के स्रोतों की ख़ोज की। साथ ही अन्य तमाम चुनौतियों के समाधान भी विज्ञान ने खोजे और धीरे धीरे खोज रहा है और सफल भी हो रहा है।

विज्ञान के जिन तथाकथित दुष्परिणामों के बारे में चर्चा की जाती है उसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि विज्ञान के क्षेत्र में जितनी तेजी से विकास हो रहा है मानव समाज उससे सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा है। समाज के विकसित होने की रफ़्तार बहुत धीमी है अतः उसके विज्ञान के साथ कदम से कदम न मिला पाने के कारण वैज्ञानिक खोजों और अविष्कारों का दुरूपयोग भी हो रहा है। वैज्ञानिक खोजों का अधिकतम सदुपयोग हो सके इसके लिए हमें एक वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से युक्त समाज की आवश्यकता है जिसके विकास की राह में धर्म सबसे बड़ा रोड़ा है। 
वैज्ञानिक द्रष्टिकोण धर्म के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है अतः धार्मिक संगठनों द्वारा लोगों को वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से दूर रखने और धर्म के प्रति उनकी आस्था को बनाये रखने के लिए लगातार बड़े पैमाने पर अभियान चलाये जाते हैं, जिसमें वे हर संभव हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। धार्मिक लोग असल में इस दुष्प्रचार के ही शिकार हैं जिसके कारण वे विज्ञान का विरोध करते हैं।
विज्ञान वास्तव में एक खोज पद्धति ही तो है जो हमें प्राकृतिक घटनाओं और उनके पीछे छुपे कारणों को समझने में मदद करती है। इसके द्वारा जो भी निष्कर्ष अथवा नयी जानकारी हमें प्राप्त होते हैं उनका प्रयोग हित और अहित दोनों में ही क्या जा सकता है। वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग कर पूरे शहर को रौशन करने वाले परमाणु बिजलीघर भी बनाये जा सकते हैं और उसी जानकारी का प्रयोग कर पूरे शहर को नष्ट कर देने वाले परमाणु बम भी बनाये जा सकते हैं। निर्भर करता है आप उस जानकारी का कैसा उपयोग करते हैं।

लेकिन फिर लोग कहते हैं कि धर्म भी तो ऐसा ही है, उसका भी उपयोग अथवा दुरूपयोग किया जा सकता है...!! तो यहाँ थोड़ा समझने कि जरुरत है। धर्म के कुछ लाभ हो सकते हैं, जैसे धर्म लोगों को झूठी आस बंधा सकता है, निरुद्देश्य जीवन को काल्पनिक ही सही पर एक उद्देश्य दे सकता है, समाज को संगठित कर सकता है। लेकिन धर्म लोगों को भ्रमित करके ही उपरोक्त लक्ष्यों को हासिल करता है, अतः लाभ कि अपेक्षा इससे हानि कहीं अधिक है। क्योंकि धर्म का आधार अज्ञान है जहाँ तार्किकता, ख़ोज, नवीनता, परिवर्तन, सुधार इत्यादि के लिए कोई स्थान नहीं है। जबकि विज्ञान नवीनता, सुधार और परिवर्तन का सदा स्वागत करता है।

धार्मिक सिद्धांत व्यवहारिक जगत में काम नहीं करते। वे सही हैं या गलत इसको जांचने का भी कोई तरीका नहीं है। जबकि वैज्ञानिक सिद्धांत इतने सटीक हैं कि आप मंगल पर उतरने वाले यान का लैंडिंग समय सेकेंड के एक अंश की सटीकता तक निर्धारित कर सकते हैं। विज्ञान का उपयोग हो या दुरूपयोग लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह काम करता है। वैज्ञनिक सिद्धांतों का प्रयोग कर जब हम कोई दवा बनाते हैं तो वह काम करती है। वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोग कर जब हम कोई विमान बनाते हैं तो वह उड़ता है। यहाँ तक की वैज्ञानिक सिद्धांतों से बना हथियार भी अपने लक्ष्य को सफलता से भेदता है। 
इससे यह सिद्ध होता है कि विज्ञान वास्तव में एक सच्ची ज्ञानमूलक पद्धति है क्योंकि विज्ञान हमें एकदम सटीक निष्कर्षों पर पहुंचाने में निर्विवाद रूप से सफल सिद्ध हुआ है। जबकि धार्मिक निष्कर्षों की तो सत्यता का ही आज तक कोई प्रमाण नहीं दिया जा सका है, न ही उनके निष्कर्षों की सत्यता की ही जाँच किसी भी तरह संभव है और न ही आज तक कोई भी यह बताने की स्थिति में है कि उन निष्कर्षों पर कैसे पहुंचा गया।
शुरुआत से ही धर्म ने हमेशा ही सारे दावे अज्ञात, अप्राप्य, अमाप्य के क्षेत्र में किये हैं। जब तक इन क्षेत्रों तक विज्ञान की पहुँच नहीं हो जाती तब इनकी सत्यता और असत्यता के सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। जैसे यदि हमें कहीं कोई बक्सा मिलता है जिस पर बड़ा सा ताला है तो जब उस ताले को तोड़कर उसके भीतर क्या है यह नहीं देखा जाता, तब तक उसके भीतर क्या है इस सम्बन्ध में कुछ भी दावा किया जा सकता है। दुनिया में कोई भी उस दावे को गलत सिद्ध नहीं कर सकता। 

धर्म के दावे भी बिल्कुल इसी श्रेणी में आते हैं। चूँकि अज्ञात का क्षेत्र ज्ञात के क्षेत्र से बहुत बड़ा है(वास्तव में हम यह भी नहीं जानते कि यह कितना बड़ा है) अतः धर्म को स्वयं को सुरक्षित रखने में कोई कठिनाई नहीं होती। अज्ञात का क्षेत्र धर्म के लिए हमेशा से ही सुरक्षित पनाहगाह रही है। जब तक लोग इस चतुराई को समझने में सक्षम नहीं होते धर्म के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है।

जो लोग धर्म को बचाने के लिए विज्ञान का विरोध करते हैं वे लोग धर्म द्वारा प्राचीन काल से पोषित इस चतुराई से अनजान हैं। या कहें वे अनजान बने रहना चाहते हैं, क्योंकि उस धर्म के साथ उनका भावनात्मक लगाव है। वे उसे किसी भी कीमत पर गलत सिद्ध होते हुए नहीं देख सकते। लेकिन ऐसा करते हुए उन्हें सोचना चाहिए कि वे वास्तव में एक सच्ची ज्ञानमूलक पद्धति का विरोध कर रहे हैं, वह भी एक अज्ञानमूलक पद्धति को सुरक्षित रखने के लिए। आखिर एक अज्ञानमूलक पद्धति को बचाने के लिए ज्ञानमूलक पद्धति का विरोध कहाँ तक उचित है? जरा सोचिये!