जानिए ! दुनिया में कौन-सा धर्म राज कर रहा है?


एक व्यक्ति ने मुझसे ‘कोरा’ पर सवाल किया कि दुनिया में कौन सा धर्म राज कर रहा है? यह लेख उसी सवाल का ज़वाब है, जो मामूली बदलाव के साथ आपके समक्ष है। अच्छा! ..तो मेरी मेरी समझ में, यह धर्मों के दावे के हिसाब से गलत सवाल है। वे दावा करते हैं कि धर्म लोगों की बराबरी, प्रेम, परोपकार, मन की शुद्धता आदि के लिए हैं। यह भी कहते हैं कि धर्म ईश्वर के नजदीक ले जाने का जरिया है। साथ ही एक बेहतर जीवन तथा मरने के बाद भी कई चीजें मुहैया कराता है। यह सब वादे हैं, हालाँकि।

कोई धर्म राज करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि मानवता की भलाई करने के लिए शुरू किये गए, ऐसा बताया जाता है। लेकिन व्यव्हार में देखें, तो आपका सवाल एकदम सटीक और धर्मों की पोल खोलने वाला है। धर्म के नाम पर तरह तरह के पागलपन हैं। धर्म प्रचार और लोगों को अपने धर्म में शामिल करने की होड़ है।

धर्म न हुआ, कॉम्पिटिशन हो गया है। कौन सबसे पुराना धर्म ? कौन धर्म सबसे अच्छा? किनके धर्म को मानने वालों की संख्या सबसे ज्यादा? कौन सा धर्म का लोग सड़क अधिक जाम करता है? कौन सा धर्म का लोग ज्यादा शोर मचाता है? कौन सा धर्म का लोग का ज्यादा इबादतगाह है? अजीब अजीब से सवाल और कम्पीटीशन।

धर्म के दावे और उनके मानानेवाले लोगों का व्यवहार में बहुत फरक है। इसलिए क्योंकि धर्म वास्तव में सत्ता की भूख के लिए और सत्ता को बनाये रखने के लिए चलाया जा रहा है। कभी लोगों को गुलाम बनाने के लिए ईसाई मिशनरियों ने धर्म का सहारा लिया और औपनिवेशिक दासता को बढ़ावा दिया। कभी धर्म के नाम पर युद्ध कर लोगों की हत्याएं की गयी। धर्म के नाम पर आत्मघाती तैयार किये जाते हैं।

भारत में ही देख लें, मंदिर-मस्जिद को बनाने को लेकर कितना पागलपन है। क्या मंदिर बनाने वाले व्यक्ति को स्कूल खोलने को लेकर पागल हुआ देखा है? नहीं न! आज लगभग 25 लाख आराधना स्थल हैं भारत में, स्कूल केवल 15 लाख तो कहा न! कम्पीटीशन है। संख्या बढ़ाने का, मंदिर मस्जिद खड़ी करने का और अपने धर्म को ऊँचा कहने का। ढोंग, आडम्बर, कुरीति, महिलाओं का दोयम दर्जा आदि सब इसी की आड़ में तो है।

आज धर्म की बात कर राजनीति भी जारी है। भारत पाकिस्तान का विभाजन भी तो धर्म के आधार पर हुआ। हजारों लोग मरे इस विभाजन के दौर में। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद कितनों की जान ले ली। आज हिन्दू-मुस्लिम के बीच भेद की दीवार और भी बढ़ चुकी है, जिसे नेता लोग वोट की राजनीति की खातिर बढ़ाते ही जा रहे हैं।

फिर भी राज करने से अगर आपका आशय उनकी संख्या से है, ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या सर्वाधिक 33 प्रतिशत है। लेकिन भविष्य में शायद धर्म इस रूप में राज नहीं कर पाएंगे। इन्टरनेट और सोशल मीडिया के कारन लोग भक्त बनना त्याग रहे हैं और अंधश्रद्धा से वे नास्तिकता, संशयवादी, धर्मनिरपेक्षता, एको-धर्मं, इंगेज्ड स्पिरीचुअलिटी आदि की तरफ बढ़ रहे हैं। इसलिए संभव है नास्तिक या बिना धार्मिक ठप्पेवाले लोगों की संख्या सर्वाधिक होगी। आज ही उनकी संख्या 16 प्रतिशत पहुँच गयी है।

– शेषनाथ वर्णवाल
(तस्वीर प्रतीकात्मक प्यु रिसर्चसेंटर से साभार)