"ऐसे लोगों को पहचानिए.. जो बड़ा जतन करके सेक्युलर बने हैं!"


मुझे पता है कि कितने मुसलमान मेरे दुश्मन हैं.. और वो हमेशा मेरे दुश्मन रहेंगे.. उनमें से ज़्यादातर अब सेलिब्रिटी हैं.. मेरे ही सामने फ़ेसबुक पर आए, मुझे फॉलो किया.. ख़ूब तारीफ़ें की.. फिर दुश्मन हो गए।

वो दुश्मन इसलिये हुवे क्यूंकि उन्हें लगता है कि जितने "सेक्युलर" वो हैं उतना ही मुझे भी रहना चाहिए। वो कहते हैं कि मैं "भावनाओं" में बह जाता हूं.. और मैं कैसा इंसान हूँ जो अपनी क़ौम और धर्म की गलतियों को छिपाने के बजाए लिख देता हूँ? ये बने हुवे सेक्युलर हैं.. बहुत कोशिश और जतन के बाद सेक्युलर होते हैं ये लोग.. इनका स्वभाव सेक्युलर नहीं है।

ये जितने मेरे अब दुश्मन हैं, एक ज़माने में मुझे चाहते थे। एक साहब हैं जिनके मुझ से कहीं ज़्यादा अब फ़ॉलोवेर्स हैं, वो जब मेरे दोस्त हुवा करते थे, तो मुझे हर दूसरे दिन फ़ोन करते थे। वो जै भीम और जै मीम नारे को बुलंद करते थे। एक दिन फ़ोन पर जब दलितों की कोई बात आई तो वो गाली देते हुवे बोले, "अरे ये सारे च***र कभी किसी के सगे नहीं हैं.. इन्हें जूते की नोक पर ही रखना ठीक है भाई।"

मैंने हैरान होकर पूछा कि "अरे, भाई आप ऐसे बोल रहे हैं.. आप तो जै भीम वाले हैं".. तो मुझ से कहने लगे कि "अरे ताबिश भाई.. आप अभी नासमझ हैं.. फ़ेसबुक की ज़िंदगी और असल जिंदगी कभी एक होती है भला?"

मैंने इन साहब को उसी दिन ब्लॉक कर दिया। उनका व्हाट्सएप्प और फ़ोन सब ब्लॉक कर दिया। अब वो मेरे दुश्मन हैं। मुझे आरएसएस का आदमी बोलते हैं और गाली दे कर बात करते हैं मेरे बारे में। ऐसे कम से कम दस लोग हैं, जो आज बहुत बड़े सेलिब्रिटी हैं, मगर उनकी असल ज़िन्दगी कुछ और है और फ़ेसबुक की कुछ और।

इन सबने बड़ी कोशिश की कि मैं उन्हीं जैसा हो "सेक्युलर" बन जाऊं.. और इसी वजह से आज आप उनके सामने मेरा नाम ले लें तो मुझे गाली देते हैं। कोई पर्सनल लड़ाई नहीं है मेरी उनसे.. बस वो ये चाहते थे कि जैसा वो चाहते हैं वैसा ही मैं लिखूं।

ये मेरी समझ के बाहर है कि कैसे फ़ेसबुक पर मैं कुछ और लिखूं और असल जिंदगी में मेरा अमल कुछ और हो। मेरे प्रोफाइल की कवर फ़ोटो पर बर्मा में बुद्ध का एक तीर्थ स्थल है.. और मेरे घर मे मेरे कमरे में बुद्ध की बड़ी सी मूर्ति है। उसी इज़्ज़त और स्नेह से रखी हुई है जिस इज़्ज़त और स्नेह से मैं बुद्ध के बारे में लिखता हूँ और उन्हें मानता हूँ। मैंने जब उस मूर्ति की फ़ोटो एक दो बार डाली तो बड़े सारे मेसैज मुझे आये मुसलमानों के.. ये पूछते हुवे कि "ताबिश भाई आप बुद्ध की मूर्ति रखे हैं.. क्यूं रखे हैं?"

मैंने इनमें से किसी को कोई जवाब नहीं दिया कभी.. क्यूंकि ये भी यही समझते हैं कि फ़ेसबुक पर सेक्युलर बनना, बुद्ध वग़ैरह की तारीफ़ करना ठीक है, मगर आम जीवन मे तो कम से कम इनके तरह "मुसलमान" बने रहो, इन्हें लगता है जैसे ये ऊपर ऊपर से दलितों की तारीफ़ कर देते हैं, हिंदुओं के देवताओं की तारीफ कर देते हैं, वैसे ही मुझे भी बस फ़ेसबुक पर ये सब करना चाहिए.. असल जीवन मे नहीं। यहां फ़ेसबुक पर कुर्बानी का विरोध कर दो, मगर घर मे चुपके से बकरा कटवा दो।

आज इरफ़ान खान को ऐसे ही एक आदमी, अली सोहराब और उसके साथी गाली दे रहे हैं। ये अली सोहराब वो हैं जिनको मेरे सारे दुश्मन बहुत पसंद करते हैं। मगर वो सब दुश्मन बहुत सेक्युलर हैं। ऐसा कुछ नहीं लिखते.. मगर अली सोहराब उनके पसंदीदा हैं। अली सोहराब लिख रहा है कि इरफ़ान खान को कैसी श्रद्धांजलि, क्यूंकि वो कुर्बानी का विरोध करता था इसलिए काफ़िर था।

इनमें से कई आपको अली सोहराब की बात का विरोध करते मिलेंगे मगर मैं जब कुर्बानी के विरोध में पोस्ट डालता हूँ, तो ये सब मेरा विरोध वैसे ही करते हैं जैसे अली सोहराब आज इरफ़ान खान का कर रहा है।

इरफान खान ने एक हिन्दू लड़की से शादी की। उसका धर्म नहीं बदलवाया। कुर्बानी जैसी इस्लामिक कुरीतियों का खुल का विरोध किया। मौलवियों को कभी पसंद नहीं किया। पूर्णतयः शाकाहारी जीवन जिया। वो सेक्युलर बने नहीं, इनकी तरह.. उनका स्वभाव "सेक्युलर" था। इनके तरह भीतर से धूर्त नहीं थे इरफ़ान.. जो जिया, उसे कहा।

अपने आसपास ऐसे लोगों को पहचानिए.. जो बड़ा जतन करके सेक्युलर बने हैं। वो इरफान खान के दुश्मन हैं.. मेरे दुश्मन हैं और मेरे जैसे हज़ारों के दुश्मन हैं। अली सोहराब को उन सबका सपोर्ट होता है, तभी उसके लाखों फ़ॉलोवेर्स हैं। गहराई समझिये इसकी। इनका पूर्णतयः बहिष्कार कीजिये, ताकि जो स्वभाव से सेक्युलर हैं, वो खुल के जी सकें और दूसरों को भी बदल सकें। आपका इन्हें फॉलो करना आतंकवाद और नफ़रत को बढ़ावा देता है.. आप इनका बहिष्कार कीजिये.. पूर्ण बहिष्कार।

    ~ ताबिश सिद्दीकी