पटना के बसों में दिव्यांगों के लिये सीट आरक्षित कराने की अविनाश ने छेड़ी मुहिम


हमारे मित्र अविनाश एक हादसे के बाद खास किस्म की दिव्यांगता की परिस्थिति में हैं। मगर जीवट व्यक्ति हैं। हर कीमत में पत्रकारिता करना चाहते थे, कई संपादकों को इनकी क्षमता पर भरोसा नहीं हुआ, मगर इन्होंने अपने संघर्ष से हिंदुस्तान, पटना में नौकरी हासिल की। इनकी इस जिजीविषा का मैं कायल हूँ और इन्हें बहुत पसंद करता हूँ।

इन्होंने आज एक अजीब बात बताई। ये अक्सर बस से गांधी मैदान से हाजीपुर जाते हैं। अक्सर इन्हें सीट भी मिल जाती है। जो इनसे परिचित हैं वे जानते हैं कि लगातार खड़े होकर यात्रा करना इनके लिए कितना कष्टकर हो सकता है। मगर पिछली दफा इन्हें पूरी यात्रा खड़े होकर ही करनी पड़ी। न बस कंडक्टर ने इन्हें सीट दिलाई, न किसी सहयात्री ने इन्हें सीट दी। यह तो अपने समाज की सहज संवेदनशीलता के लोप होने की कथा है।

असल बात यह है कि हाल-हाल तक बसों में जो दिव्यांगों के लिये सीट आरक्षित होती थी, उसका भी लोप हो गया है। अविनाश जी ने पहले उस सीट के बारे में तफ्तीश की, जब बताया गया कि इस रूट पर कई बसों में दिव्यांगों के लिये सीट रिजर्व नहीं है तो इन्होंने इस बात की ऑनलाइन शिकायत की। जब उस शिकायत पर भी कार्रवाई नहीं हुई तो इन्होंने परिवहन आयुक्त को फोन से शिकायत की।

जवाब में परिवहन आयुक्त ने कहा कि आप विभाग में आकर लिखित शिकायत कीजिये, तब हम देखेंगे। मतलब समझिये कि हम देखेंगे वाली फ़ैज़ की यह नज्म जनता से अधिक अधिकारियों को पसंद आती है।

फिलहाल अविनाश ने पटना के बसों में दिव्यांगों के लिये सीट आरक्षित कराने की मुहिम शुरू की है, आपसे साथ देने का आग्रह है।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। साथ ही चर्चित पुस्तक जब नील का दाग मिटा: चंपारण  1917 के लेखक भी हैं।