आस्था को भड़का कर उनकी कमाई पर जीनेवाले, ये परजीवी संन्यासी !

तस्वीर प्रतीकात्मक ‘ध्रुव गुप्त’ की वाल से साभार।

प्रयाग के अर्द्धकुंभ मेले में जिन लाखों साधु-संन्यासियों के शाही स्नान और भव्य कल्पवास के लिए सरकार ने चार हजार करोड़ खर्च किए और जिनके लिए अब 'भारत रत्न' की भी मांग होने लगी है, उनका हमारे देश और समाज की बेहतरी में क्या योगदान है ? लोगों की आस्था को भड़का कर उनकी कमाई पर विलासिता का 'संन्यास' जीने वाले ये लोग वस्तुतः समाज के सबसे बड़े परजीवी रहे हैं।

यह बात सभी धर्मों के धर्मगुरुओं के लिए सच है। ऐसे करोड़ों परजीवी लोगों की चिंता में हमारी दुनिया नहीं, दुनिया से परे कोई काल्पनिक लोक है। उनके लिए संसार मिथ्या है और इसमें आवागमन से मुक्ति जीवन का लक्ष्य। उनकी आध्यात्मिक कसरत मानसिक एकाग्रता के लिए तो ठीक है, उनके माध्यम से अगर वे संसार का अतिक्रमण कर किसी काल्पनिक स्वर्ग या मोक्ष की तलाश में हैं, तो यह आत्मरति के सिवा कुछ नहीं।

तमाम अस्तित्व, मोह-माया, इच्छाओं और गति से परे मोक्ष शून्य की ही कोई स्थिति हो सकती है और कोई भी शून्य अस्तित्व या ऊर्जा के पूरी तरह नष्ट हो जाने से ही संभव है। ऊर्जा चाहे पदार्थ की हो या जीवन की, कभी नष्ट होती नहीं। उसका रूपांतरण होता चलता है। हम छोटी-छोटी ऊर्जाएं हैं जो रूप बदल-बदलकर इसी प्रकृति में बनी रहेंगी।

यदि ईश्वर सच है तो उसकी कृति मिथ्या नहीं हो सकती। उसकी सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य और उससे उत्पन्न संवेदना, प्रेम और करुणा ही उस तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है। यह प्रकृति उसी की प्रतिच्छवि है। सूरज-चांद-तारों में है उसका नूर। फूलों में उसकी मुस्कान। बच्चों की हंसी में उसकी मासूमियत। स्त्रियों में उसका ममत्व। नदी, समुद्र, बादल और पक्षियों के संगीत में उसका स्वर। प्रकृति से संपूर्ण सामंजस्य और उसकी संतानों के बीच परस्पर प्रेम और सहकार में ही स्वर्ग, मोक्ष और निर्वाण है।

इसे पाने के लिए तमाम धार्मिक कर्मकांड या कठोर साधना की नहीं, छोटे बच्चों की चमकती आंखों और मासूम दिल की दरकार होती है। एक शफ्फाफ़ सा दिल, इक ज़रा भोली आंखें
ये अगर है तो उसके नूर से खाली क्या है !

ध्रुव गुप्त की वाल से साभार