किसानों की समस्या का हल कर्जमाफ़ी है ?

मज़ेदार यह है कि आजतक यह किसी ने नहीं कहा। दिल्ली में जब पहली बार तमिलनाडु के किसान आये थे तो उन्होंने कहा कि हमें सही मूल्य दे दीजिए हमारे उत्पाद का। कभी कर्ज़माफ़ी की बात नहीं करेंगे। अभी जब फिर से किसान आये तो भी उनकी प्रमुख माँग यही थी कि स्वामीनाथन कमेटी के अनुसार सही मूल्य मिले उत्पाद का। राहुल गांधी ने भी कहा कि कर्ज़माफ़ी कोई हल नहीं है, हल कॉम्प्लेक्स है।

जो लोग कल से गाँव दिखा रहे हैं मुझे उनसे आग्रह है कि अगला टूर जब बने तो ज़रा देखें कि फसलों के भंडारण की व्यवस्था क्या है? पूरे देश मे एफ सी आई के गोदामों की हालत देख लें ज़रा और फिर उन निजी कंपनियों के भंडार भी जिन्हें लगातार प्रमोट किया गया है। अगर न समझ मे आ रहा हो भंडारण और कृषि उपज मूल्य का रिश्ता तो किसानों से बात कर लें या ज़रा पढ़ लें। जिस समय कृषि उपज आती है बाज़ार में ज़ाहिर है कि उसकी सप्लाई एक साथ आने से मूल्य गिर जाते हैं। बहुत थोड़ा सा हिस्सा एम् एस पी पर बिक पाता है और किसान को बाक़ी औने पौने दाम पर बिचौलियों को बेचना पड़ता है क्योंकि उसके पास भंडारण की सुविधा नहीं। यह सुविधा हो तो वह अपना अनाज़ तब तक भंडार कर सकता है जब तक बाज़ार में डिमांड सप्लाई इक्वेशन ठीक न हो जाएँ।

प्रतीकात्मक तस्वीर एनडीटीवी  से साभार।

चलते चलते यह भी जान लें कि एम् एस पी सिद्धांत: न्यूनतम समर्थन मूल्य है
, एक फ्लोर प्राइस। सरकार बाज़ार भाव इससे नीचे गिरने पर सपोर्ट करने के लिए यह व्यवस्था लेकर आई थी। आदर्श रूप से अधिकतम किसानों को इससे ऊँचा मूल्य बाज़ार में मिलना चाहिए।

उनसे यह भी आग्रह है कि एक बार कृषि के लिए सबसे ज़रूरी अधिरचना "सिंचाई के साधनों" की हालत देख लें और गाँवों में विद्युत् सप्लाई की स्थिति भी। बाक़ी बीज, खाद, दवाई आदि आदि का बाज़ार तो क़स्बों में भी घूमते दिख ही जाएगा। एक लाइन में कहूं तो कृषि के पूरे मार्केटिंग सिस्टम को इसा बनाया गया है कि किसान एक अजीब से दुश्चक्र में फँसता चला गया है। एक तरफ़ लागत मूल्य बढ़ता चला जा रहा है तो दूसरी तरफ़ उत्पाद का सही मूल्य लगातार उससे दूर होता जा रहा है। उसी के उत्पाद से बिचौलिए मज़े करते हैं और बड़े व्यापारी और रईस होते चले जाते हैं। जो धनिया आप मुफ्त मांगते हैं उसे उपजाने में भी पैसा लगता है, कभी गुना के अंदरूनी हिस्सों में चले जाइए।
इसलिए क़र्ज़माफ़ी असल में इस अन्याय का मुआवज़ा है। इसके आगे ज़रूरी तो यही है कि कृषि की पूरी व्यवस्था को लाभकारी बनाने के लिए केंद्र और राज्य के स्तर नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। कृषि भंडारण और कृषि विपणन की व्यवस्था को किसानों के अनुरूप बनाए जाने की ज़रूरत है तो ग़ैर कृषि मौसम में वैकल्पिक रोज़गारों की व्यवस्था कृषि मज़दूरों को सम्मानजनक जीवन जीने तथा पलायन से रोकने में कारगर होगी।

एक बार हो ऐसा फिर ज़रूरत पड़ने पर सरकारें किसानों से उधार ले सकेंगी...।

अशोक कुमार पाण्डेय की वाल से साभार