जब एक दिन आपके पास न खेत बचेगा और न नौकरी, तब आप सिर्फ गुलाम होंगे

हमारी सारी शिक्षा नौकरी केंद्रित है, ताकि युवा शिक्षित होकर पूंजीपति की कम्पनी में नौकरी कर सके और पूँजी वाद के गुण गाये। साथ ही उनकी सारी ज़मीने पूंजीपतियों की मिल्कियत बन जाए। याद रखियेगा, एक दिन ये पूंजीपति अपने मुनाफे के लिये नौकरियां कम करते जायेंगे और आपके पास तब ना खेत बचेगा ना नौकरी, तब आप सिर्फ इनके गुलाम होंगे और पूंजीपति की कृपा पर जीने के लिये मजबूर होंगे। तब भयंकर भूख फैलेगी। ऐसा इतिहास में कई बार हुआ है जब भयंकर भूख फ़ैली है और लाखों लोग भूख से मर गये।
भारत में बंगाल में अकाल से लाखों लोग मारे गये थे, सोमालिया अभी मर रहा है। भारत में लाखों लोग भूखे और कुपोषित हैं। इसलिये नहीं क्योंकि हमारे पास गेहूं नहीं है, बल्कि इसलिये कि हमने उनके हाथ से ज़मीनें और काम करने के अवसर छीन कर, पैसे वालों के हाथों में सौंप दिया है।
इतिहास में कितने ही बिजनेस दूसरों की सम्पत्ति पर शासन किया और हिंसा की मदद से कब्जा किया। ऐसा करने को ही बिजनेस करने का काम कहा जाता था। अमेरिका में आदिवासियों की ज़मीनों पर कब्ज़े और उनकी बिक्री का काम क्या था ? बिजिनेस या लूट? आज भी भारत में आदिवासियों की ज़मीनों पर व्यापारियों द्वारा सरकारी बंदूकों की मदद से किया जा रहा, लूट नहीं तो क्या है ? क्या आप इसे बिजिनेस कहते हैं ?
इन के शेयर के रेट तभी बढ़ेंगे जब आदिवासियों की ज़मीनों पर व्यापारियों का कब्ज़ा हो जायेगा। अब सवाल है कि ज़मीन का मालिक कौन है ? क्या पूंजीपति और व्यापारियों की जेब में पड़ी हुई सरकार और उनकी नौकर पुलिस मालिक है या आदिवासी और किसान ?
आपने एक करोड रूपये के शेयर खरीदे। एक माह बाद उसकी कीमत दो करोड हो गयी। अब आपके पास दो करोड की खरीद शक्ति जमा हो गयी। आप इस दो करोड का गेहूं भी खरीद सकते हैं। अब एक ही हफ्ते में आप दो करोड रूपये के गेहूं के मालिक हो गये। आप ने कोई श्रम नहीं किया, लेकिन आप बैठे बैठे एक हफ्ते में दुगने उत्पाद के मालिक हो जाते हैं।


दूसरी तरफ मेहनत से गेहूं पैदा करने वाले की खरीद शक्ति कभी नहीं बढ़ती। ऐसे में तो मेहनत करने वाला नुकसान में और बैठ कर कमाने वाले मज़े में। यही सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। इस पर सवाल उठाना ज़रूरी है। इसे बदलना भी ज़रूरी है। लेकिन बिना मेहनत किये मज़े करने वाले लोग इसे बदलने नहीं देंगे। बिना मेहनत किए बैठे बैठे जिन का पैसा बढ़ता जाता है, वे लोग बदलाव की कोशिश करने वाले लोगों पर हमला कर देते हैं।

इनके हमले का विरोध करने वालों को नक्सली और राजद्रोही कह देते हैं। सरकार, पुलिस और मीडिया इन बैठे बैठे पैसा कमाने वालों की जेब में पड़ी रहती है। यही पूंजीवाद है। इसलिए पूंजीवाद से, हिंसा, दुःख, गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार निकलेगा। इससे शान्ति, समानता और सौन्दर्य निकल ही नहीं सकता।

मनुष्य की क्षमता का विकास इस व्यवस्था में संभव ही नहीं है।